Sunday, January 1, 2012

एक पल ना ठहरी नींद मेरी आँखों में
तेरी यादें मोगरे सा तन महकाती रही
और मेरे मन से नज़में बहती रही !

Sunday, October 23, 2011

:)



प्यार के दौर में
छूट जायेगा साथ मेरा
अपनी ही आत्मा से
ऐसा पता ना था
जब सोचा फुरसत में बैठकर
ये ब्रह्म ज्ञान पाया
मेरी आत्मा मेरे ही पास रहती
तो वो तुममे एकाकार कैसे होती ?

Saturday, May 28, 2011

तेरे बिन


खो जाते हैं शब्द जैसे
ग़ुम हो जाती है उल्काएं गगन से
सूख जाती है भावनाए मोसमी झरनों जैसे
नहीं बहती कवितायेँ मेरे मन से
जब तुमसे बात नहीं होती !

Monday, March 21, 2011

:)


ये ख्वाबों कि बारिशे नहीं छोडती सूखा मुझे
इस बार तुम ही सूरज बन कर आओ...

Wednesday, January 26, 2011

तुम याद आते हो

रात के लम्बे सफ़र में
जब नींद नहीं आती
करवटे बदलते बदलते
तो तुम याद आते हो

खाना खाते खाते जब
कुछ गले में अटक जाता है
और कोई पानी नहीं लाता
तो तुम याद आते हो

रास्ते पर चलते चलते
जब थक कर जाती हूँ
तुम्हे थाम चलने को जी चाहता है
तो तुम याद आते हो

किसी से जब होता है झगडा
या किसी बात पर होता है मन खराब
तुम्हारे गले लगने को जी चाहता है
तो तुम याद आते हो

Tuesday, January 18, 2011

...


तेरी हवा में रहेगी
मेरे ख्याल की खुशबू,
पर जानां
खुशबू की तरह
ना तुम मुझे देख पाओगे
ना ही अब छू सकोगे !

Thursday, January 13, 2011

:)


तेरे होने का अहसास
हर पल एक बराबर मुझसे जुड़ा है
वक़्त जैसे हर पल हर लम्हे में बराबर बटा है
किसी हिस्से में ना कम ना ज्यादा हुआ है
ऐसे ही तू कहीं रहे, किसी के साथ हो
हर किसी को बस पूरा मिला है :)

Tuesday, January 4, 2011

इश्क


वो खुदा जिसका नाम था हर अजान में

वो हमें पहले कभी नज़र ना आया

पर जबसे तुझसे इश्क हुआ

उसके होने का अहसास हर पल पाया !

Thursday, November 11, 2010

:)

तुमको जब भी करीब पाती हूँ
मैं हर गम को भूल जाती हूँ !

Monday, September 6, 2010

बरसाते

कभी अच्छी लगती थी बरसाते मुझे
जब तेरे प्यार कि बारिश में भीगती थी मैं
आज भी अच्छी लगती हैं बरसाते
जब जी भर रोने को बारिश में भीगती हूँ मैं!

Monday, August 23, 2010


ये मोहब्बत कि राह भी अजीब हैं
जब लगा मंजिल मिल गयी पता चला
अभी तो सफ़र शुरू हुआ ही नहीं !

Tuesday, August 3, 2010

प्यार मत करना

माँ कहती थी
प्यार मत करना
पापा कहते थे
लड़कों से दूर ही रहना
दीदी कहती थी
पापा का नाम खराब मत करना
हमारे जैसे घरों कि लड़कियां प्यार नहीं करती!

पर माँ-पापा-दीदी आपने ये तो कभी बताया ही नहीं
कि जब मन किसी से बंधने लगे तो क्या करना,
जब कोई बिना बताये ज़िन्दगी में शामिल हो जाये
तो उसको कैसे बाहर करना
और आपने ये भी तो नहीं बताया
कि प्यार न होने के लिए क्या करना?

Monday, July 26, 2010

पल



अंधियारी रात में
सड़क के किनारे
लेम्पपोस्ट के नीचे झरती
मद्धम मद्धम रौशनी में
बेंच पर बैठे
एक दूसरे को देखते
कुछ मुस्कुराते
कुछ आंसू लाते
कुछ बेफिक्र से बहते
कुछ गाते से पल
आँखों में ऐसे बस गए हैं
जैसे सीप में मोती !

Sunday, March 21, 2010

क्यों भाई क्यों

यह कविता मेरे बचपन की सबसे सुनहरी स्मृति है. जो मुझे आज तक याद है. इस कविता के साथ ही मैने पहली बार मंच पर अकेले प्रस्तुति दी थी 15 अगस्त के अवसर पर. तब मैं कक्षा 5 में पढ़ती थी. इस कविता के बाद से विद्यालय में सब मुझे "क्यों भाई क्यों" के नाम से बुलाने लगे थे. यह कविता आज़ादी के काल की है गाँव गाँव में आज़ादी की अलख जगायी और इस कविता का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी किया गया. कविता के बोल पूरी तरह से मुझे याद नही फिर भी कोशिश कर रही हूँ आप सबसे साथ इसे बाँटने की-

क्यों भाई क्यों
क्यों क्यों क्यों?

आसमान में इतने सारे
चमचम क्यूँ करते हैं तारे
इंद्रधनुष के सातों रंग हमें
लगे क्यूँ इतने प्यारे?

क्यों भाई क्यों
क्यों क्यों क्यों?

जवा कुसुम एक अकेला
होता क्यूँ है इतना लाल
झिलमिल झिलमिल करता रहता
जूही-चमेली का क्यों जाल?

क्यों भाई क्यों
क्यों क्यों क्यों?

फ़र फ़र कोवे तोते
आसमान में क्यों उड़ जाते
बिल्ली मौसी के बालों में पंख
नही फिर क्यों उग आते?

क्यों भाई क्यों
क्यों क्यों क्यों?

छोटे छोटे रामू राधा
रोज फिरे क्यूँ माँ के साथ
बर्तन घिसते, डाँटे सुनते
फिर भी नंगें , फैले हाथ?

क्यों भाई क्यों
क्यों क्यों क्यों?

क्यूँ है भूख ग़रीबी क्यों है
क्यों अनपढ़ है,निर्धन क्यों है
क्यों ना मिले न्याय सभी को
क्यों फैला है भ्रष्टाचार ?

क्यों भाई क्यों
क्यों क्यों क्यों?

आओ हम सब मिलके सोचे
हम सब एक परिवार
किसने की है बम की साज़िश
क्यों इतने सारे हथियार?

ले भाई ले हम सब ले!

Thursday, February 18, 2010


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

एक कतरा आकाश, एक कतरा धरती,
दो किरणे सूरज,दो किरणे चांदनी की,
और बस दो बूँद तेरे इश्क की काफी है
ज़िन्दगी मुक्कमल करने के लिए !

Friday, November 20, 2009

माय री ना तू मेहंदी लगाने की जिद कर
मुझे पहले से चढ़ा इश्क की मेहंदी का रंग
जो किसी दुकान में ढूंढे ना मिले
और जिसका रंग कभी ना फीका पड़े !

Sunday, September 20, 2009

तेरी नींद के लिए लुटाने पड़े
सपने मेरे ख़ज़ाने से तो सौदा बुरा नहीँ
तेरी आँखों की चमक के लिए लेनी पड़े
रोशनी उधार सूरज से तो भी सौदा बुरा नही
तेरी एक हँसी के लिए थामे रखने पड़े
आँसू अपनी आँखों मे तो भी सौदा बुरा नहीं!

Friday, September 4, 2009

तुमसे मिलने

आऊँगी मैं तुमसे मिलने
लाँघकर चीन की दीवार
तैर कर हिंद महसागर
पार कर अफ्रीका के जंगल भी
चढ़ कर एवरेस्ट की छोटी
उड़ कर आकाश में भी
नही झिझकुंगी एक बार भी
बनाने कबूतर को संदेशवाहक
या उल्लू को पथ प्रदर्शक में
मैं चिड़िया के पँखो पर हो सवार
आकाश पार कर तुमसे मिलने आऊँगी
मैं डाल्फिन पर बैठकर
सागर की गहराइयों को पार कर तुमसे मिलने आऊँगी
मैं जुगनू को साथ लेकर
अंधेरी रात में तुमसे मिलने आऊँगी !

Tuesday, May 12, 2009

माँ

माँ 

दिया तुमने मुझे वरदान जीवन का 
दी तुमने ही मुझे ये हसीन ज़िंदगी 
आई मैं इस दुनिया में तुम्हारा दामन थामकर 
सीखा है चलना मैने तुम्हारी उंगली पकड़कर 
खोली जब आँखे मैने तुम्हे ही देखा था पहली बार 
मेरी एक हँसी पर तुम वारी जाती थी 
मेरे एक आँसू पर तुम घबरा सी जाती थी 
मेरी एक छींक पर तुमने सारी रात जागकर काटी
मेरी एक ज़िद पर तुम दुनिया सारी ला देती 
माँ ही बोला था मैने जीवन का पहला शब्द 
तब तुम्हारी आँखो में एक चमक सी आई थी! 

माँ 
दिया तुमने मुझे वरदान जीवन का 
दी तुमने ही मुझे ये हसीन ज़िंदगी 
खेलती है होंठो पर मेरे तुम्हारी ही मुस्कान 
वाणी से मेरी निकलते हैं तुम्हारे ही सुर
झलकती है चेहरे से तुम्हारी सी आभा 
धैर्य है मुझमे तुम्हारे ही जैसा 
घटा है कशों मे मेरे तुम्हारे जैसी 
हृदय में है मेरे तुम्हारे जैसा प्यार 
बातों में है मेरे तुम्हारी जैसी शुचिता 
संस्कार है मुझमे तुम्हारे ही दिए हुए 
लय है ज़िंदगी में तुम्हारे जैसी. 

माँ 
दिया तुमने मुझे वरदान जीवन का 
दी तुमने ही मुझे ये हसीन ज़िंदगी!

Monday, April 20, 2009

इंतज़ार

थी मैं कितनी अधीर
तुमसे मिलने से पहले
इंतज़ार मुझे काटने को दौड़ता था
एक एक पल सदियों पुराना लगता था
हँसती थी मैं उन पर
जो इंतज़ार की राह में बैठे होते थे
और कहती थी
इंतज़ार से बड़ा पागलपना और क्या होगा एस दुनिया में?
पर तुमसे मिलने के बाद
पहली बार लगा
इंतज़ार का मज़ा ही कुछ और है
ना दिन, ना हफ्ते, ना महीने
बल्कि कई सालों तक किया जा सकता है इंतज़ार
आज बरसों बीत गये
मुझे तुम्हारा इंतज़ार करते हुए
पर तुम भी तक नही आए
ना ही तुम्हारी कोई खबर आयी
पर फिर भी हूँ मैं
बैठी इंतज़ार की राह में
और आज गुज़रता हुआ एक शख़्स बोला
इंतज़ार से बड़ा पागलपना और क्या होगा एस दुनिया में
और हंसकर मेरे करीब से गुज़र गया!